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Thursday, 31 May 2018

जमशेदपुर: सिर्फ एक शहर या कुछ ज्यादा?


जमशेदपुर क्या है? माना कि ये अपने स्टील इंडस्ट्रीज के लिए जाना जाता है, पर क्या ये बस इन्हीं तक सीमित है?
नहीं। जमशेदपुर कहने को तो बस एक इंडस्ट्रियल सिटी है पर यहाँ रहने वाले किसी से पूछ कर देखिये! यादों का और एहसासों का एक ऐसा पिटारा खुलेगा जो आपकी सोच को बदल देगा।
इस क्लीन और ग्रीन सिटी में रहने वाले हर बच्चे का बचपन टाटा ज़ू के उछलते कूदते जानवर और जुबिली पार्क के खूबसूरत गुलाब देखकर बीतता है। ऐसा शायद ही कोई व्यक्ति हो जिसने गोलपहाड़ी मंदिर की चढ़ाई न की हो या साकची बाज़ार की भीड़ में पसीना न बहाया हो। फिर आमबगान में लगने वाला डिज़्नी लैंड मेला कौन भूल सकता है भला! चाहे गणेश पूजा हो या दुर्गा पूजा, यहाँ हर त्यौहार उतनी ही धूमधाम से मनाया जाता है। छठ पूजा का उल्लास और सरस्वती पूजा के वक़्त छोटी-छोटी लड़कियों को साड़ी पहनकर घूमते देखना अलग ही आनंद देता है। जितने अलग यहाँ त्योहारों के नाम हैं, उतने ही निराले ढंग से यहाँ इन्हें मनाया जाता है।
इस समतल ज़मीन से जब बाहर से आये लोगों को दलमा के हरे-भरे पहाड़ नज़र आते है तो उनके लिए इस बात को हज़म करना ज़रा मुश्किल हो जाता है। उस पर खड़काई और दोमुहानि से लगकर बना मरीन ड्राइव सबका मन मोह लेता है। सुबह-शाम राज्य पक्षी कोयल के गानों से भला जमशेदपुर में कौन वाकिफ़ नहीं!?
जिस तरह लोग जमशेदपुर में बसते हैं, उसी तरह यहाँ के हर इंसान में उसका अपना जमशेदपुर बसता है।
यह शहर कहने को तो बहुत पुराना है, पर विकास के इस दौर में यह बदलाव से कदम मिलाकर चला है। समय के साथ यहाँ शौपिंग मॉल, मूवी थिएटर, रेस्ट्रॉन्ट और होटल, ऊँची इमारतें सब बन गए हैं। आज ऐसी कोई चीज़ नहीं जिसके लिए किसी को यहाँ से बहार जाना पड़े। खनिज के उपयोग के साथ-साथ यह शहर चीज़ों की उपयोगिता भी खूब जानता है। इस्तेमाल किये हुए प्लास्टिक के उपयोग से सड़कों का निर्माण इसका मात्र एक उदाहरण भर है।
चाहे सोनारी का साई मंदिर हो या रुसी मोदी सेंटर के सामने का पिरामिड, चाहे जे आर डी टाटा स्पोर्ट्स ग्राउंड हो या बिस्टुपुर का गोपाल मैदान, आकर्षण के केंद्र यहाँ कम नहीं हैं।

ये तो बस तस्वीर का एक भाग है। ऐसे जाने कितने भाग हर जमशेदपुरवासी के अंदर बसते हैं। हर व्यक्ति इस शहर को अलग नज़र से देखता है। हर किसी की अपनी कहानी है, हर किसी के अपने अनुभव। कहने को..तो ये बस एक शहर भर है, पर ये सिर्फ एक शहर नहीं यहाँ के लोगों का एक हिस्सा है।

चित्र: जमशेदपुरसिटी

Wednesday, 30 May 2018

हिन्दी केवल भाषा नहीं

अब भी कुछ लोग हैं जो हवा में रस घोल लेते हैं
अब भी कुछ लोग हैं जो हिंदी बोल लेते हैं
ये पंक्तियाँ यूँ तो आम तरह की ही हैं, पर नहीं, ये आम नहीं हैं। ये वो पंक्तियाँ हैं जो आज के समाज की, आज के भारत की दयनीय अवस्था को बयां करती हैं। हिंदी हमारे समाज का वो हिस्सा है जिससे हम बने हैं, जो हमारे अस्तित्व को पहचान देता है। पर स्थिति आज ऐसी है कि भारत जैसे देश में हिंदी बोलने वालों की कमी हो रही है। लोग अंग्रेज़ बनने की होड़ में हिंदी से दूर हो रहे हैं। आज लोग भारत में नहीं, इंडिया में जी रहे हैं। आज हर बच्चे को अच्छी हिंदी आती हो या नहीं, उसे अच्छी अंग्रेज़ी ज़रूर सिखाई जाती है, मानो अंग्रेज़ी भाषा न हुई, आदमी की इज़्ज़त हो। चीनी के बाद विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा आज अपने ही राष्ट्र में अपने अस्तित्व, अपनी पूर्णता, अपने सम्मान के लिए लड़ रही है। क्या यही है हम? हमें खुद से पूछने की ज़रूरत है कि क्या हम सच में हिन्दुस्तानी कहलाने के लायक हैं!? इस हिंदीवादि कहे जाने वाले राष्ट्र के ही कुछ लोग आज इसे हीनता की दृष्टि से देखते हैं, जिसे सिर्फ हिंदी आती है उसे कुछ नहीं आता।
वैश्वीकरण ने अंग्रेज़ी को एक आवश्यक भाषा बना दिया है। इसका सबसे अधिक प्रभाव नयी पीढ़ी पर पड़ा है और आगे की पीढ़ियों पर पड़ रहा है। आज हर किसी की सुबह गुड मॉर्निंग और रात गुड़ नाईट से होती है। किसी ने कुछ दिया हो तो थैंक यू कहते हैं और किसी से कुछ लेना हो तो प्लीज़। ऐसे में कैसे हो हिंदी का प्रचार? हिंदी दिवस आते ही हिंदी पर प्रतियोगिताएँ, पखवाड़े, फलाना-फलाना चीज़ें आयोजित की जाती है। एक दिन के लिए हिन्दी को सर पर बैठाकर फिर नीचे उतार दिया जाता है।
हिन्दी को जितनी मान्यता मिलनी चाहिए उतनी नहीं मिल रही। आज़ादी के 70 साल बाद भी भारत अंग्रेज़ियत से आज़ाद नहीं हो पाया है। राष्ट्र के मुद्दे अब भी वही घिसे-पिटे है, कभी राजनीति तो कभी भ्रष्टाचार, कभी तेल तो कभी ईवीएम। पर केवल यही नहीं, भारत में आज हिंदी का प्रयोग भी मुद्दा है और उसका प्रयोग न होना भी। यह केवल एक बहस का मुद्दा बनकर रह गयी है।
सभी भारतियों को यह समझने की ज़रूरत है कि हिंदी केवल एक भाषा नहीं है, उनकी पहचान का हिस्सा। हिंदी का प्रयोग शर्म की नहीं बल्कि गर्व की बाद है। इसे केवल एक दिन न देकर हमेशा उतना ही महत्व देना आवश्यक है जितने की वो हक़दार है।
चित्र: दैनिक जागरण

Sunday, 27 May 2018

Prostitute: No woman is by choice


The female body is a temple.. no it isn't. It is a brothel instead. Never is it asked what it desires. It is fed with luxuries and then lied upon. The night is the hour of this body, because at this time the libido of the man is at its peak. And the so-called temple isn't even taken into consideration for having any such thing.
Prostitution.. the word itself is a taboo in today's society where beginning the day with one woman and ending it with another is a symbol of sophistication for men. Yes, because he then becomes the most desirable or at worse a Casanova, but never slut shamed.
India has the worst case scenario in this case. There are around 10 million commercial sex workers in India. Yes, 10 million prostitutes who sell their bodies solely for money. About 2 lakh 75thousand brothels run a business of millions with a hike of 2 lakh per year. 3/4th of the prostitutes work here due to poverty and 1/4th work due to marital problems. Women who are either there due to helplessness or are forced into prostitution have either the worst or no option left with them. Hence they sell their bodies for money. Neither is their libido satisfied nor are their desires looked into. They get no pleasure and only pain.
But hey!! This being a major issue in human as well as a country's development  is ever ignored. Instead the very men who sleep with these so called sluts or bitches spit on them once they are done.
I ask...how are they any different from these women who sell their bodies? The sexual engagement occurs between two people then how is one ostracized and the other accepted in the society? Is that man too not a prostitute in one way? And what right does he have to label a character certificate to that woman he slept with? And why does he not do this with his very own wife?
The so called male dominated society is a mass of hypocrisy. And its principles and ideas a bundle of contradictions. These men idolize porn stars and actresses who are naked - either partially or completely in front of the whole world. But slut shame these prostitutes who do it for feeding their families. Poor men!!
The need is to look at both sexes with the same respect in one's eyes. Even if it is a prostitute who is talked about. No woman is a prostitute by birth or choice. It is simply the wrath of time that forces them into this misery.
     Pic: Legal bite

Thursday, 24 May 2018

मेरा दर्पण

आज..मेरा दर्पण मुझसे पूछ रहा था
क्या वही है तू
जो पहले थी?
या वक़्त के पहरेदारों ने
तुझे पहचानना छोड़ दिया?
इधर घड़ी की टिक-टॉक टिक-टॉक सुनते हुए
मैं मुस्कुरा रही थी उसके सामने
और वो
भौंहे सिकोड़े देख रहा था मुझे
मुझसे ज़्यादा रंगीन था वो
मैं किसी ब्लैक-एंड-वाइट पिक्चर-सी लग रही थी उसके सामने
मेरा दर्पण
मुझे काम्प्लेक्स दे रहा था
शायद सुपेरिओरटी..
सच..मेरा दर्पण बिलकुल नहीं बदला था
पर मेरे जैसा होकर भी
मुझ-सा नहीं था वो
मुझसे गुफ़्तगु के इंतज़ार में कुछ बूढ़ा हो चला था वो
मानो मैं एडोलसेंट रह गयी
और वो एडल्ट हो गया
मानो वो बोल्ड हो गया
और मुझे क्लीन बोल्ड कर दिया हो
मेरा दर्पण मुझे आँखें दिखा रहा था
कह रहा था
तुम चली तो मेरे साथ थी
फिर पीछे कहाँ रुक गयी?
अब क्या बताती मैं उसे
कि इस गधों की रेस में
खुद को ढूंढ रही थी?
कि जब खुद को ही दूसरों में ढूंढ रही थी
तो तुम्हे क्या देखती?
मेरा दर्पण..
मुझसे नाराज़ था
पर एक वही था जो
रात के अँधेरे में भी
मेरे अंदर ही कहीं छुपा बैठ था
जो मेरा अपना था
मेरा दर्पण नाराज़ था मुझसे
पर मना ही लिया मैंने उसे
अब दुनिया से तो उसे मनाना आसान ही था

Monday, 26 March 2018

नवधान्या



 देव संस्कृति विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जन संचार केंद्र की ओर से विद्यार्थियों को देहरादून में स्थित नवधान्या के भ्रमण पर ले जाया गया, जहाँ उन्होंने बीजों की महत्ता व उनके संरक्षण के बारे में जाना। नवधान्या, डाॅ. वंदना षिवा द्वारा स्थापित एक बीज संस्थान है। यह बीजों के रूप में पर्यायवरण व जीवन दोनों का संरक्षण करता है। इसका मूल आधार वसुधैव कुटुम्बकम है, जिसके माध्यम से यह भारत की जैव विविधता की रक्षा करता है।
नवधान्य का अर्थ है- नौ बीज, जिनमें यव, शामक, तोगरी, मदगा, कदाले, तंदूला, तिल, माशा व कुलिट्ठा शामिल हैं। 1984 में स्थापित इस गैर सरकारी संस्था को 34 वर्ष पूरे हो चुके हैं। इस दौरान ये पूरे देश में 54 बीज खाते खोल चुके हैं तथा 5 लाख किसानों को प्रशिक्षण प्रदान कर चुके हैं।

जैविक खेती पर ज़ोर देेते हुए इन्होंने बीज विद्यापीठ नामक एक शिक्षण केंद्र की भी स्थापना की है, जो कि उत्तराखंड के देहरादून में स्थित है। नवधान्या जीएमओ सीड्स के सख्त खिलाफ है। 1991 में इनके द्वारा जीएमओ सीड्स के खिलाफ एक अभियान भी चलाया था, जिसका नाम- जीएमओ फ्री कैंपेन है। यह अभियान अब तक चला आ रहा है।

नवधान्या के इन्हीं कार्यों के बारे जानने की ओर विद्यार्थियों ने एक कदम बढ़ाया। संस्थान के अंदर जाने पर श्री दिनेष सेमवाल जी द्वारा सभी का अभिनंदन किया गया। इसके पश्चात सभी को गज़ेबु कहे जाने वाले एक झोपड़े में बैठाया गया। इस दौरान सेमवाल जी ने सभी को बताया कि पिछले वर्ष तीन लाख दस हज़ार किसानों ने आत्महत्या की थी, जिनमें से अधिकतर जेनेटिकली माॅडिफाईड(जीएमओ) बीजों का प्रयोग करते थे। इन बीजों की वजह से न तो फसल अच्छी हो पाई और न ही किसानों के कर्ज़ की भरपाई हुई। अतः उनके पास आत्महत्या करने के अलावा दूसरा कोई रास्ता न था।

वर्षों पहले तक भी हालात कुछ अलग नहीं थे। भारतवासी नील की खेती करने को मजबूर थे, और उसके बाद अत्यधिक मात्रा में पेड़ों को काटा जाने लगा। उस दौरान कुछ लोग पेड़ों के संरक्षण के लिए आगे आए, जिनमें गौरा देवी प्रमुख थी। उन्हीं से पे्ररित होकर डाॅ. वंदना शिवा बीज संरक्षण की ओर अग्रसर हुई।
श्रीमान सेमवाल जी ने कहा कि नवधान्या के प्रयास एक गिलहरी की तरह है, किन्तु वह अपनी ओर सेे आगे बढ़ने की सदा कोशिश करती रहेगी। उन्होंने बीजों के बारे में बात करते हुए कहा कि जिन बीजों का वे संरक्षण करते हैं, वे उनके नहीं, अपितु किसानों के ही हैं। उन्होंने हरित क्रांति के समय के पंजाब व हरियाणा का उदाहरण देते हुए कहा कि अधिक मात्रा में यदि जीएमओ सीड्स का प्रयोग किया जाए व बीजों का संरक्षण न किया जाए तो वह वक्त दूर नहीं जब हज़ारों फ़सलों का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। पंजाब की हालत को बयां करते हुए उन्होंने वहाँ से चलने वाली कैंसर ट्रेन का भी ज़िक्र किया।

नवधान्या न सिर्फ प्रकृति पर, अथवा महिलाओं पर भी उचित ध्यान देता है। उनका मानना है कि महिलाएं बेहतर तरीके से प्रकृति की रक्षा कर सकती हैं।  इसी संदर्भ में आगे कहते हुए उन्होंने कहा कि- महिलाओं की रक्षा प्रकृति की रक्षा तथा प्रकृति की रक्षा महिलाओं की रक्षा है। महिलाओं का प्रकृति से रिश्ता ही इको फ़ेमिनिस्म है।

फसलों के बारे में बताते हुए उन्हांेने कहा कि वे ऐसे अनाजों की खेती करते हैं जो आपस में एक दूसरे की उत्पादकता व पोषण का काम करती हैं। इनमें मुख्यतः मोटे अनाज शामिल होते हैं, जो समय के साथ कम होते जा रहे हैं। इसका एक मुख्य कारण है कि आज के किसानों में मोनोकल्चर का प्रचलन बढ़ रहा है, जिस कारण एक फसल खराब होने पर दूसरा कोई विकल्प नहीं रह जाता। 

 

अपने बीज खाते(बैंक) का भ्रमण करवाते हुए उन्होंने बताया कि देहरादून का सीड बैंक नवधान्या का पहला बैंक है, जिसे बीजा देवी नामक एक स्त्री ने शुरू किया था। उन्होंने बताया कि उनके बीज बैंक में 730 प्रकार के धान, 41 प्रकार के बासमती, 212 तरह के गेहूं, 32 तरह के जौ, आदि कई तरह के बीज संरक्षित हैं। नवधान्या के 17 राज्यों में 120 बीज बैंक हैं। जिन बीजों का संरक्षण वे करते हैं, उन्हें सिर्फ दो महीनों तक रखा जा सकता है। इन बीजों को बचाने के लिए, बीज बैंक को गोबर से लीपा जाता है तथा कुछ फूल उन बीजों के साथ रखे जाते हैं, ताकि उनका कीट-पतंगों व जीवाणुओं से बचाव हो सके। बीज बैंक के अलावा नवधान्या में गौ पालन भी किया जाता है। वहीं पत्तों व गोबर से जैविक खाद का उत्पादन होता है।

नवधान्या के माध्यम से समय-समय पर प्रशिक्षण पाठ्यक्रम भी चल रहे हैं। दाल यात्रा, बीज सत्याग्रह, पल्स आॅफ लाईफ, आदि अभियान इनमें से कुछ हैं। इनके अलावा यहाँ के आम्रपाली(आम के बाग) में प्रत्येक वर्ष आमोत्सव भी मनाया जाता है।

नवधान्या का वातावरण बहुत ही शांत, साफ और सुंदर है। यहाँ शोध के लिए आए लोगों ने पाया कि नवधान्या में 78 प्रकार के पक्षी हैं। आसपास के अन्य किसी भी जगह पर इतने पक्षी नहीं पाए गए।

अतः नवधान्या जैसे संस्थान का भ्रमण सभी के लिए बहुत लाभदायक व ज्ञानवर्धक रहा। भारत को ऐसे और संस्थानों की आवश्यकता है, क्योंकि वह दिन दूर नहीं जब पेड़ों की तादाद अत्यधिक कम हो चुकी होगी। ऐसे में, ग्लोबल वार्मिंग के इस काल में खाद्य संरक्षण एक विशेष मुद्दा है। 

रिपोर्टः वर्षा चौरसिया, निकिता पटेल
           पत्रकारिता एवं जनसंचार
 




Saturday, 30 December 2017

If I Ever Have A Daughter


If I ever have a daughter
I would call her just my child
And not define her by her gender
I will teach her how to fly
But keep her roots grounded
She will never be called weak
She'll be a warrior
A fighter
A conqueror
She will wear what she wishes to
Because clothes are not her dignity
Its her soul
I will teach her about her body
Because sex is not a taboo
If I ever have a daughter
She'll be my pride
She will be the owner of her life
Because she would know its value
There would be words written for her
But words would never be enough to define her

Thursday, 28 December 2017

महँगी होती इंसानियत

हँस लो यारो
हँसी तुम्हारे आईफोन से भी महँगी होने वाली है
आज लोग आईफोन को तरसते हैं
कल हँसी को तरसेंगे
वो दिन दूर नहीं
जब कह रहे होंगे हम
कि यारो!
साँस ले लो
ऑक्सीजन की कीमत चुकाने का
वक़्त आ गया है
हर चीज़ जिस की कीमत
आज नहीं मालूम है तुम्हें
हर उस चीज़ पर जान लुटाओगे तुम
फिर भी कीमत नहीं
चुका पाओगे तुम
खुद को इंसान कहने वाले ही
प्रकृति की इंसानियत
के बोझ तले
दबे हैं
और कितना खुद को नीचे
गिराओगे तुम
ये जो नाम मिला है तुम्हें
इसने नदी, हवा, धरती, अंबर
मन, शरीर, विचार, शब्द
सबको गंदा कर दिया है
हाँ वो दिन भी दूर नहीं
जब इंसान भी
न कहलाओगे तुम



सरहदें

कल जो बातें जोड़ती थी हमें
आज उन्होंने ही सरहदें बना दी है
लगता ही नहीं की इंसान हैं हम
शायद सरहदें देखकर
पड़ोसी देश हो चले हैं हम
जो लाईन ऑफ़ कंट्रोल से
एक दूसरे पर नज़र रखते हैं
सामने कोई हरकत होने पर
जवाबी हमला भी करते हैं
पर कोई पूछ ले हम से
एक-दूसरे के बारे में
तो यूँ मुँह फेर लेते हैं
मानो कोई वास्ता ही न हो
एक दूसरे से
सच! सरहदें बाँट देती हैं
पर खुद कभी नहीं बँटती
तो क्यों न सरहदें ही बन जाए हम
एक दूसरे की
पड़ोसी देशों की सरहदें एक होती हैं न
सरहदों की तो सरहद नहीं होती न
तो आओ चलो सरहद बन जाए
आओ चलो एक हो जाए
और सारी दुनिया को
पड़ोसी देश बना ले अपने


Tuesday, 26 December 2017

खुद को भी इंसान बनाकर बताओ तो जाने

हाँ पंख नहीं है तुम पे
फिर भी आकाश में उड़ना आसान है
कभी ज़मीन पर बिन लड़खड़ाये
चलकर बताओ तो जाने
हर वक़्त दौड़ते फिरते हो
आगे बढ़ने की होड़ में
एक लम्हा थमकर
जीकर बताओ तो जाने
चेहरे पे चेहरे लगा रखे हैं
कचरे से चेहरा सजाये बैठे हो
कभी अपने-आप को भी सबको
दिखाकर बताओ तो जाने
ईंटों से दीवार बनाते जा रहे
सपनों के संसार बनाते जा रहे
कभी मिट्टी के टीले
बनाकर बताओ तो जाने
हर रोज़ नए मकान सजाते रहते हो
रिश्तों के बाज़ार बनाते जा रहे
मकान तो हर कोई बना लेता है
अपनों से घरबार
बनाकर बताओ तो जाने



Tuesday, 19 December 2017

I Think


I think and think and think
At times when I'm alone
At times when people look at me
At times when no one's watching
Though my thoughts
Don't appear on my face
But the process is reflected well
Still, I think
I think I'm the master of my own world
Though I'm not
In fact, I have several masters to be named
And no
They aren't my parents
Or my teachers at school or college
No they aren't my friends
Or the experiences of my life
Those masters are
Pretty close actually
My masters are my fears
And my anxieties
They are the rules that bind me
My master is the society
And the famous chaar log
My master are the norms
That some nobody created
Yes, I'm the master of no one
In fact, I'm a slave to my masters
I'm a slave at service
A slave on duty
But don't you misjudge me
My duty is not bowing to my weaknesses
My duty is to rise up above
My duty is to grow enough
To be a student
And not a slave
I think of my hairs
Long and open
Free to be tangled by the wind
I think of my lips
Not trembling with fear
But murmuring the lyrics of a song
I think of those invisible wings
That grow on me
And take me to the skies
I think, because I'm the controller
Of my thoughts
If not the master of my world
I think again
Because there's no 'my world '
I think
Because I'm free to think

Trying To Be

I'm not a stranger to myself I'm just trying to be To let someone else Know me The way I tried and lost Though I know myself...